बक्रोक्ति का शो केस
#बक्रोक्ति_का_शो_केस...
©® Munna Kumar
शब्दों के ढ़ेर में सुलगता मैं
जब कागजों पे बिखरता हूँ
तो कई रूहों की सिसकियां
मेरे लेखनी से टकराकर
मुझे हर वक्त उद्वेलित करती है
शहरी गोधूलि के
सूर्यास्त का रोमांच
गजब का भभका पैदा करता रहा है
हवाओं में
ढ़लते सूरज की
नवपुल्कित रोशनी में
पैदा होती मानवीय हवस की
बक्र रेखायें
चित्रपट रंगोली की
गणित में उलझता मानव मन
जब मृदंगित होकर
बदचलनी से सरोबार
अपने-अपने चेहरों के
बनावटी मुखौटों को
जयरामपेशा औरतों के
शरीर में उगे खूंटी पे टांग
रंगीन इच्छाओं की पूर्ति में
मस्त हो जाता है
तब ये कवि मन विकल हो
सरल रेखाओं के नीचे
अक्षरों के तांडव नृत्य से
बक्रोक्ति का "शो केस" सजा
उसे सरे बाजार करता है,
©® Munna Kumar
शब्दों के ढ़ेर में सुलगता मैं
जब कागजों पे बिखरता हूँ
तो कई रूहों की सिसकियां
मेरे लेखनी से टकराकर
मुझे हर वक्त उद्वेलित करती है
शहरी गोधूलि के
सूर्यास्त का रोमांच
गजब का भभका पैदा करता रहा है
हवाओं में
ढ़लते सूरज की
नवपुल्कित रोशनी में
पैदा होती मानवीय हवस की
बक्र रेखायें
चित्रपट रंगोली की
गणित में उलझता मानव मन
जब मृदंगित होकर
बदचलनी से सरोबार
अपने-अपने चेहरों के
बनावटी मुखौटों को
जयरामपेशा औरतों के
शरीर में उगे खूंटी पे टांग
रंगीन इच्छाओं की पूर्ति में
मस्त हो जाता है
तब ये कवि मन विकल हो
सरल रेखाओं के नीचे
अक्षरों के तांडव नृत्य से
बक्रोक्ति का "शो केस" सजा
उसे सरे बाजार करता है,
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