चुनावी दंगल

चुनावी दंगल
                      ©® Munna Kumar

घरों से सड़कों तक
सड़कों से संसद तक
इस चुनावी माहौल में
आज कल मैं
नित्य ही गिरते हुए शब्दों के बीच
अपने उटपटांग शब्दों से
देश का नया सूर्योदय तलाश रहा हूँ

न जाने किस ठौर में
विलीन हो चुकी है
देश की आत्मीयता
कि अपना देश अब
सिर्फ मझहबी और अनगिनत जातिय छोरों में
बंधकर देश की अखंडता-एकता और छद्म राष्ट्रवाद की
दुहाई दे दे कर
हर पार्टियों का हर नेता खुद को देश का
परवरदिगार बता रहा है

राजनीतिक धंधेबाजों के होड़ में
टुच्चे राजनेता बाँट रहे हैं खुलेआम
एक साथ कई अकरच-बकरच अफवाहें
बन्द कमरों में रोज गुफ्तगू जारी है
ठहाकों की जोर आजमाइशों के साथ
शामों में बेहयाई का शमा बंधा है
नौटंकी के इस महापर्व में
चाहे जितना भी नीचे गिरना पड़े
थमा कर हर किरदारों को
उनकी अदायगी की बाहियात लिस्ट
हर हाल में
धन बल छल से
स्वास्तिक चिह्न के रुख को
अपनी तरफ मोड़ लाना है,,

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