स्वास्तिक चिह्न का ठप्पा

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                                      ©® Munna kumar


हंगामा मत करो 

कुछ नहीं फर्क पड़ेगा 

आ जाओगे सौ दो सौ की जमात में

कभी बाजार बन्द कराओगे 

कभी चक्के जाम करोगे 

कुछ कोरे आश्वासनों के बाद

अपना और देश समाज का 

एक अमूल्य दिन बर्बाद कर

फिर हँसते गाते हुल्लड़ मचाते 

घर चले जाओगे 

तुम्हारी मांगे पन्नों में समेट कर 

दफ्तर के काले दराजों में धकेल दी जायेंगी

और तुम्हारी फड़कती भुजायें 

फिर कई टेबलों से सरकती हुई

अनगिनत ठोकरें खायेगी 

जहां दिवाल पे टँगे गांधी जी के 

आदमकद कलेंडर के नीचे

गांधी जी के चलंत फ़ोटुओं के 

मोटे बंडल की ही डिमांड की जायेगी 


अखबारों पे छपे मोटे-मोटे काले अक्षरों में

सरकार की प्रगति की गाथाओं का इश्तेहार 

देश का बदलता तस्वीर 

बढ़ता जी डी पी 

बढ़ता आयात और आद्योगिक क्रांति 

तुम्हें गौरवांवित करेंगे 

और फिर तुम सब कुछ भूलकर 

देश की तरक्की का बनकर जिंदा गवाह 

भेड़ चाल में शामिल होने को

जैसे कोई अबला दो जून की रोटी के लिए 

साहूकार के आगे बिछने को तैयार रहती है 

बिल्कुल वैसे ही क्षणिक लोभ में 

जाति धर्म की लाठी को पकड़कर 

स्वास्तिक चिह्न का ठप्पा लगा

फिर से गंदी राजनीति का हिस्सा बनोगे

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